अगर किसान संगठनों में आपसी टूट बढ़ी तो सरकार बची हुई दो मांगों पर नहीं झुकेगी

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किसानों और सरकार के बीच बुधवार को सातवें दौर की बातचीत में दो मुद्दों पर रजामंदी बन गई। हालांकि, दो बड़े मुद्दों- कृषि कानूनों को वापस लेने की मांग और मिनिमम सपोर्ट प्राइस यानी MSP पर लीगल गारंटी को लेकर अभी भी रजामंदी नहीं बन पाई है। इस बीच, किसानों का एक बड़ा संगठन भारतीय किसान यूनियन-उग्राहां बाकी यूनियनों से अलग रुख अपनाए हुए है। माना जा रहा है कि अगर किसान संगठनों के बीच टूट बढ़ी तो सरकार बचे हुए दो मुद्दों पर ना झुके।

किसान संगठनों में आपसी टूट की खबरें अब सामने आने लगी हैं। जो किसान संगठन भारतीय किसान यूनियन-उग्राहां अलग रुख अपनाए हुए है, उसका जनाधार काफी ज्यादा है। इसे सबसे बड़े किसान संगठनों में से एक माना जाता है। टिकरी बॉर्डर पर यही संगठन सबसे ज्यादा एक्टिव है। इस संगठन का मंच बाकी के संयुक्त संगठनों से अलग लगा हुआ है।

उग्राहां वही संगठन है, जिसकी मांगों में छात्र नेताओं और राजनीतिक कैदियों की रिहाई का मुद्दा शामिल रहा है। हाल ही में इस संगठन के मंच पर दिल्ली दंगों के आरोपियों के पोस्टर दिखे थे। इसके चलते यह विवादों से घिर गया था। यह भी खबरें आ रही हैं कि बाकी संगठनों ने उग्राहां ग्रुप से किनारा करना शुरू कर दिया है।

आपसी टकराव बढ़ सकता है
माना जा रहा है कि आने वाले दिनों में किसान संगठनों के बीच आपसी टकराव कुछ और बढ़ सकता है, क्योंकि कई संगठन नए कृषि कानूनों में बड़े बदलाव करने के सरकार के प्रस्ताव पर सहमति जता सकते हैं। फिलहाल बाकी किसान संगठन तीनों कानूनों को पूरी तरह रद्द किए जाने की अपनी मांग को लेकर कोई भी समझौता करने को तैयार नहीं दिख रहे। उनका कहना है कि अगर नए कानून रद्द नहीं हुए, तो आंदोलन जारी रखेंगे।

किसान नेताओं को भी लग रहा है कि सरकार झुकेगी नहीं
बड़े किसान नेता गुरनाम चढ़ूंनी मानते हैं कि अगली बैठक में सरकार बाकी मांगों पर भी मान जाए, यह कहना मुश्किल है। अब भी आंदोलन की दो सबसे बड़ी मांगें नहीं मानी गई हैं। MSP पर लिखित गारंटी और तीनों नए कानूनों को रद्द करने की मांग पर सरकार ने अभी कोई संकेत नहीं दिया है। अगली बैठक में भी सरकार इस पर तैयार होती नजर नहीं आ रही।

चढ़ूंनी कहते हैं कि 4 जनवरी को होने वाली बैठक में भी अगर सरकार सिर्फ नए कानूनों में संशोधन का ही प्रस्ताव रखने जा रही है, तो इसका कोई फायदा नहीं है क्योंकि इन कानूनों के पूरी तरह रद्द होने से पहले किसान अपना आंदोलन वापस नहीं लेंगे।

इस बीच, किसान नेता दल्लेवाल का कहना था कि बुधवार की बैठक में सरकार का रुख काफी नरम नजर आया और उन्हें उम्मीद है कि अगली बैठक में सरकार बाकी मांगों पर राजी हो सकती है।

किसानों ने ट्रैक्टर रैली टाली, लेकिन बॉर्डर पर डटे रहेंगे
31 जनवरी को किसान एक बड़ी ट्रैक्टर रैली करने वाले थे, लेकिन सरकार से हुई सकारात्मक बातचीत को देखते हुए किसानों ने इसे टाल दिया है। किसान नेताओं का कहना है कि 4 जनवरी को होने वाली अगली बैठक में अगर बाकी शर्तों पर सहमति नहीं बनी, तो वे यह रैली करेंगे। किसान नेताओं का कहना है कि आज की बातचीत के बाद भी फिलहाल आंदोलन में कोई बदलाव नहीं होगा और नए साल पर वे दिल्ली के बॉर्डर पर ही डटे रहेंगे।

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सरकार और किसानों के बीच बुधवार को 7वें दौर की बातचीत हुई। इस दौरान हमेशा की तरह किसान खाना अपने साथ ले गए थे। विज्ञान भवन में मीटिंग के बीच उन्होंने जमीन पर बैठकर खाना खाया।

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