Saturday, April 17, 2021
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कनेक्टिविटी और सोशल सपोर्ट बेहद जरूरी, जानिए एक्सपर्ट्स महामारी जैसे हालात में जीने की क्या सीख दे रहे

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साल 2020 बीत चुका है। आज न्यू इयर यानी नए साल की दूसरी तारीख है, बीते साल पूरी दुनिया में वह हुआ, जो उससे पहले शायद कभी नहीं हुआ और वह है लॉकडाउन। इसके बहुत से साइडइफेक्ट देखने को मिले, जैसे- लोगों की नौकरियां गईं, अर्थव्यवस्थाएं ध्वस्त हो गईं।

इसके साथ ही लोगों को मानसिक समस्याओं का भी सामना करना पड़ा। घर और परिवार से दूर रहे लाखों लोग अकेले हो गए। इसके चलते तनाव, एंग्जाइटी और डिप्रेशन के मामले बढ़ गए, लेकिन एक्सपर्ट्स का मानना है कि इस दौर को एक सीख के तौर पर देखा जाना चाहिए। एक्सपर्ट्स इसी से जुड़ी कुछ सलाह भी दे रहे हैं।

महामारी में अकेलेपन से कैसे लड़ें?

साल बीत गया है, लेकिन महामारी अभी गई नहीं है। वैक्सीन आ गई है तो लोगों में थोड़ी राहत है। अच्छी बात है कि हमें पॉजिटिव रहना चाहिए, लेकिन सावधान भी। जिस तरह से ब्रिटेन में मामले बढ़ रहे हैं, कुछ कह नहीं सकते कि आगे क्या होगा। हमें किसी भी स्थिति के लिए तैयार रहना चाहिए।

अमेरिका के बकिंघम यंग यूनिवर्सिटी साइकोलॉजी और न्यूरोसाइंस के प्रोफेसर जूलियन हॉल्ट-लंसटैड ऐसी स्थिति में अकेलेपन से निपटने के दो तरीके बता रहे हैं। पहला कनेक्टिविटी के जरिए और दूसरा सोशल सपोर्ट के जरिए।

  1. कनेक्टिविटी- आज हम एक डिजिटल युग में जी रहे हैं। सब कुछ बहुत आसान हो गया है। लोग मीलों दूर होकर भी पास हैं, ऐसा माहौल बनाया जा सकता है। जब भी इस तरह की मुसीबत आए तो सबसे पहले हमें लोगों से जुड़ना चाहिए। एक डिजिटल कम्यूनिटी बनानी चाहिए। लॉकडाउन के दौरान यह देखा गया कि यह तरीका 70% तक असरदार है।

  2. सोशल सपोर्ट- यह सबसे अच्छा तरीका इसलिए है, क्योंकि इसमें हम सिर्फ खुद का भला नहीं कर रहे होते हैं, बल्कि आसपास के लोग भी इससे फायदा उठा सकते हैं। जब भी इस तरह की स्थिति सामने हो तो हमें समाज का सहारा लेना चाहिए।

ऐसे हालात में नए लोगों से कैसे मिलें?

अमेरिका की एक रिटायर्ड टीचर और दो बच्चों की मां जूलिया होट्ज नए लोगों से मिलने की हैबिट रखती हैं। वह लोगों पर किताबें लिखती हैं और लोगों से जुड़ी नई-नई स्टडी भी पब्लिश करती हैं। जूलिया कहती हैं कि मैं लॉकडाउन में मानसिक तौर पर इतना परेशान रहने लगी थी कि वह उसे शब्दों में बयां नहीं कर सकती। मुझे लगा कि मैं सरवाइव नहीं कर पाऊंगी। मैंने इससे छुटकारा पाने के लिए दो तरीके अपनाए, पहला डिजिटल रूम और दूसरा सोशल इंट्रैक्शन।

  1. डिजिटल रूम- जूलिया जूम पर एक रूम बनाती थीं, उसमें वह करीब 10-12 अंजान लोगों को शामिल करती थीं। इस दौरान सभी एक-दूसरे से इंटरैक्ट होते थे, जो लोग उस रूम को पसंद करते थे उनको छोड़कर बाकी सब लीव कर जाते थे। इस तरह से जूलिया को हर दिन एक-दो ऐसे अंजान लोग मिलने लगे, जिनसे वे क्लोज हो सकें और उनकी कुछ यूनीक चीजों को अपनी डायरी में लिख सकें।

  2. सोशल इंट्रैक्शन- हमारे आसपास मोहल्ले और कस्बों में नए लोगों का आना लगा रहता है, लेकिन कितने-कितने दिनों तक हम उनके बारे में कुछ जान नहीं पाते, न ही वे हमारे बारे में। जूलिया ने उन लोगों से मिलना भी शुरू कर दिया। वे कहती हैं कि उन्हें उनके आसपास आठ-दस अंजान लोग ऐसे मिले, जिनसे मिलकर उन्हें अच्छा लगा और उनकी चीजों को अपनी डायरी में लिखा। कहने का मतलब है कि हम समाज से कटते जा रहे हैं, जबकि यह अकेलेपन की सबसे बड़ी दवा है।

ऐसे माहौल में सीजनल एफेक्टिव डिसऑर्डर से कैसे बचें?

मौसम की वजह से होने वाले बदलावों से हमारी मानसिक स्थिति पर भी असर पड़ता है। इसके चलते गुस्सा, चिड़चिड़ापन और तनाव भी होने लगता है। ये कई बार डिप्रेशन की वजह भी बनता है, यानी मौसम बदलने से भी डिप्रेशन हो सकता है। ऐसे मानसिक असंतुलन की वजह से जो तनाव और डिप्रेशन होता है, उसे सीजनल एफेक्टिव डिसऑर्डर कहते हैं। कोरोनाकाल में जब लोग अकेले रहने को मजबूर थे तो इसका असर ज्यादा देखने को मिला। अमेरिका के साइकोलॉजिस्ट जने ब्रॉडी इससे बचने के दो सुझाव बता रहे हैं। पहला मानसिक रेजिस्टेंस और दूसरा सोशल थेरेपी।

  1. मानसिक रेजिस्टेंस- सीजनल इफेक्टिव डिसऑर्डर सिर्फ एक मानसिक समस्या नहीं है, बल्कि यह एक शारीरिक समस्या भी है। इससे बचने के लिए सबसे पहले तो हमें शरीर में विटामिन D की कमी नही होने देनी है। साथ ही जब इसके चलते तनाव हो, तो हमें उससे रेजिस्ट करना चाहिए या उबरने की कोशिश करनी चाहिए। ऐसा करके हम बदले हुए मौसम में खुद को मानसिक तौर पर एडजेस्ट कर लेंगे।

  2. सोशल थेरेपी- आसपास जो कुछ एक दो लोग हों, उनसे ऐसी समस्याओं को साझा कीजिए। अगर उसे भी आप जैसा महसूस हो रहा है तो आप दोनों खुद की समस्याओं को साझा करके, एक-दूसरे को सुझाव दे सकते हैं। दरअसल ऐसा करके आप अच्छा महसूस कर पाएंगे और सीजनल इफेक्टिव डिसऑर्डर के असर को कम कर सकेंगे।

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Last year, millions of people became victims of loneliness, know what experts are suggesting to deal with it in situations like epidemic?

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