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अपूर्वा मंडावली. कोरोना को 9 महीने हो चुके हैं। अब तक इसे लेकर हजारों स्टडी हो चुकी हैं, लेकिन हर नई स्टडी पुरानी को खारिज कर रही है। यानी कुछ भी पुख्ता नहीं मिल पा रहा। अमेरिका में एंटीबॉडी को लेकर कई तरह की स्टडी सामने आई हैं।

ला इंस्टीट्यूट ऑफ इम्यूनोलॉजी की नई स्टडी के मुताबिक, कई लोगों में पर्याप्त मात्रा में इम्यून सेल मिले हैं, जो कोरोना से बचा सकते हैं। यह मेमोरी सेल हैं, जो लंबे समय तक बॉडी में बने रहेंगे। यह रिसर्च ऑनलाइन पब्लिश की गई है। वॉयरोलॉजिस्ट शेन क्रोटी का कहना है कि मेमोरी सेल बनने से बड़ी संख्या में लोगों को गंभीर बीमारी से बचाया सका है।

वहीं, स्टडी में यह बात भी सामने आई है कि कोरोना से ठीक हुए मरीजों में अलग-अलग एंटीबॉडी बन रही हैं। कुछ में कमजोर तो कुछ में मजबूत एंटीबॉडी देखने को मिली हैं। मजबूत एंटीबॉडी कोरोना से लड़ने में कारगर साबित हो रही है, जबकि कमजोर एंटीबॉडी लॉन्ग-कोविड की वजह बन रही है।

जानिए एंटीबॉडी को लेकर हाल में हुई अलग-अलग स्टडी क्या कहती हैं-

17 साल तक शरीर में बने रहेंगे इम्यून सेल

ला इंस्टीट्यूट के रिसर्च ने एक्सपर्ट्स को थोड़ी राहत दी है। इससे पहले एक्सपर्ट्स को लगता था कि कोरोना के बाद इम्यूनिटी कम समय तक ही शरीर में बनी रहती है और कोरोना पर काबू पाने के लिए वैक्सीन ही उपाय है। लेकिन इस स्टडी में दावा किया गया है कि इम्यून सेल रिकवरी के 17 साल तक शरीर में बने रहेंगे।

जब तक दवाई नहीं, तब तक इम्यून में ढिलाई नहीं

  • कुछ हफ्ते पहले हुई एक और स्टडी में पाया गया था कि जो लोग कोरोना से रिकवर हुए हैं। उनके अंदर भी पावरफुल और प्रोटेक्टिव इम्यून सेल हैं, जो कोरोना से लड़ने में सक्षम हैं। भले ही उनके अंदर एंटीबॉडी डेवलप हुई हो या नहीं। यानी जब तक दवाई नहीं, तब तक इम्यून में ढिलाई नहीं। वैक्सीन आने तक कोरोना से बचने का सबसे कारगर तरीका यही है कि हम अपने इम्यून सिस्टम को मजबूत रखें।
  • टोरंटो यूनिवर्सिटी की इम्यूनोलॉजिस्ट जेनीफर गोमरमैन की स्टडी के मुताबिक, कुछ लोगों में रिकवरी के बाद बन रहे इम्यून सेल शरीर में लंबे समय तक नहीं रुक रहे हैं। लेकिन ऐसा उन लोगों के साथ हो रहा है, जिनमें कोरोना का असर ज्यादा हुआ था।

पहले की स्टडी में इसके उलट बातें सामने आईं थीं

  • कुछ महीने पहले एक रिपोर्ट में सामने आया था कि इम्यूनिटी कुछ महीनों में गायब हो सकती है। इस वजह से लोग दोबारा वायरस की चपेट में आ सकते हैं। वहीं, कुछ इम्यूनोलॉजिस्ट ने यह देखा है कि एंटीबॉडी का लेवल कम होना नेचुरल है। एंटीबॉडी इम्यून सिस्टम का हिस्सा है जो कम ज्यादा हो सकती है।

एंटीबॉडी क्या काम करती है?

  • एंटीबॉडी की जरूरत ब्लड में पड़ती है। यह वायरस और उसके संक्रमण को फैलने से रोकती है। इसे स्टेरलाइजिंग इम्यूनिटी के तौर पर भी जाना जाता है। इसमें अलग-अलग सेल्स होते हैं, जो तमाम तरह के वायरस से लड़ते हैं।
  • ला इंस्टीट्यूट ऑफ इम्यूनोलॉजी में इम्यूनोलॉजिस्ट एलेसेंड्रो सेट्टे का कहना है कि स्टेरलाइजिंग इम्यूनिटी हर बार काम नहीं करती है। इसलिए कई बार लोग दोबारा वायरस से संक्रमित हो जाते हैं। कोरोना के साथ भी यही समस्या है। यह सीधे इम्यून सिस्टम पर ही चोट करता है, जिसके चलते लॉन्ग-कोविड जैसी समस्याएं सामने आ रही हैं।
  • लॉन्ग कोविड के 70% मरीजों के ऑर्गन्स डैमेज हो रहे, इस बारे में वो सब जो जानना जरूरी है...

सभी के शरीर में मजबूत एंटीबॉडी बनें, यह जरूरी नहीं

  • अमेरिकी डॉक्टरों ने कोरोना से ठीक हुईं 19 से 81 साल की उम्र वाली 185 महिलाओं पर स्टडी की। इनमें ज्यादातर महिलाएं ऐसी थीं, जिनमें हल्के लक्षण थे और हॉस्पिटल में भर्ती नहीं हुईं थीं। इन सभी का ब्लड सैंपल लेकर डॉक्टरों ने शोध शुरू किया।
  • टीम ने इम्यून सिस्टम के चार भागों को चुना। इनमें एंटीबॉडी, बी-सेल और दो तरह के टी-सेल शामिल थे। बी-सेल एंटीबॉडी बनाने में मदद करता है। टी-सेल संक्रमित सेल को खत्म करता है। डॉक्टर क्रोटी का कहना है कि अलग-अलग महिलाओं के एंटीबॉडी में 200 पाॅइंट्स तक का अंतर पाया गया।
  • स्टडी में यह भी पाया गया कि टी-सेल धीरे-धीरे घट रहा है, जबकि बी-सेल का लेवल बढ़ रहा है। टी-सेल का कम होना कमजोर एंटीबॉडी के लक्षण हैं। इसलिए पूरी दुनिया में अपनाई जा रही एंटीबॉडी थेरेपी की टेक्निक उतना काम नहीं कर रही, जितने की उम्मीद जताई जा रही थी। डॉक्टरों का मानना है कि एंटीबॉडी देने से पहले उसके क्षमता की जांच करना जरूरी है।

कम संख्या में एंटीबॉडी वायरस रोकने के लिए काफी नहीं

कोलंबिया यूनिवर्सिटी के डॉक्टर जेफरी शमन ने अपनी स्टडी में बताया है कि दोबारा संक्रमण न फैले, इसे लेकर हमें चिंता करने की जरूरत है। फिलहाल वैज्ञानिकों को यह पता नहीं है कि वायरस से बचाव के लिए किस लेवल पर इम्यून सेल की जरूरत पड़ती है। लेकिन स्टडी से पता चलता है कि कम संख्या में एंटीबॉडी, टी और बी सेल वायरस से बचाव नहीं कर सकते।

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स्टडी में दावा-  कोरोना से ठीक हुए मरीजों में दो तरह की बन रही एंटीबॉडी वीक और स्ट्रॉन्ग। अभी तक दी जा रही एंटीबॉडी में इसकी जांच नहीं की जा रही थी, इसीलिए एंटीबॉडी कम कारगर साबित हुई।

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